Friday, 18 May 2018

डेंगू या वायरल - भ्रांतियाँ एवं सच : जानिए और रहिए भयमुक्त

     
दोस्तों ! आजकल मुख्यत:  दिल्ली और उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में वायरल और डेंगू बुखार का प्रकोप बहुत भीषण रूप ले चुका है । ना जाने कितनी मौतें हो चुकी हैं । मैं डॉक्टर नहीं हूँ लेकिन डॉक्टर से पूछ कर NET  पर सर्च कर के एक साधारण भाषा में इस लेख को लिखने का प्रयास किया है । डेंगू को लेकर कैंसर की तरह का जो डर लोगों के चेहरे पर दिखाई पड़ रहा है, उस डर ने मुझे प्रेरित किया है कि आम भाषा में आम आदमी के लिए एक लेख लिखूँ ।
       डेंगू के बारे में जो लोगों के मन में अफरा - तफरी मची हुई है उसके कुछ कारण हैं , जो हमें समझ आ रहे हैं --
a - आधी अधूरी जानकारी
b - अफवाहों के आधार पर इलाज
c - कुछ  डॉक्टरों द्वारा मरीजों की लाचारी का फायदा उठाना
d -  ख़ून की महंगी जांचें
e - महंगी दवाईयाँ
f -  आखरी बात इंसान के दिमाग पर डर का हावी होना
       तो आइए सिलसिलेवार जानने की कोशिश करते हैं वायरल और डेंगू के बारे में। किन परिस्थितियों में  हमें क्या करना चाहिए,  इसके बारे में भी जानते हैं।
1 -  वायरल और डेंगू  है क्या ?   यह दोनों ही एक ऐसे बुखार है जो कि एक खास तरह के वायरस के शरीर में प्रवेश करने से होते हैं। इसमें से डेंगू बुखार  चार तरह का होता है अर्थात डेंगू के चार तरह के वायरस होते हैं । किसी एक प्रकार के वायरस से जब डेंगू होता है तो उस वायरस के प्रति आपका शरीर immune हो जाता है,  इसका अर्थ है कि उस वायरस से दोबारा कभी डेंगू नहीं होगा लेकिन बचे हुए तीन वायरस से डेंगू दोबारा हो सकता है । अगला डेंगू बुखार पहले वाले से ज्यादा गंभीर हो सकता है ।
2 -  क्योंकि यह वायरस है इसलिए यह किसी भी तरह की दवाई से नहीं मरते और आज तक इसकी कोई दवाई बनी ही नहीं है ।
3 - इस वायरस से प्रभावित लोगों को एक खास प्रकार के मच्छरों द्वारा काट लेना और फिर उन्हीं मच्छरों के द्वारा स्वस्थ व्यक्ति को काट लेने पर ,  स्वस्थ व्यक्ति को भी यह बुखार हो जाता है । यह वायरस हवा द्वारा , जुकाम, खासने, छींकने या  मरीज को छूने मात्र से कभी भी नहीं फैलता है।
4 - यह खास मच्छर सूर्योदय  से लेकर सूर्यास्त तक ही क्रियाशील रहते हैं अर्थात आप अपने आप को मच्छरों से दिन में बचाएँ  ना कि रात में।
5 - ये मच्छर अन्धेरी , ठण्डी और छाँव वाली जगह पर रहना पसंद करते हैं।
6 - रक्खे हुए साफ पानी में ये मच्छर breed करते हैं एवं प्रजनन क्षेत्र के 200 मीटर के अन्दर ही उड़ते हैं । पानी सूख जाने के बाद भी  12 महीनों तक जिन्दा रह सकते हैं । इसलिए  पीने का पानी ढककर रक्खें एवं बाकी जगह मिट्टी के तेल अथवा मच्छर मारने की दवा का छिड़काव करें ।
7 - डेंगू का मच्छर ऊँचाई में लगभग मनुष्य के घुटनों  तक ही उड़ सकता है इसलिए नारियल तेल लीजिए और तलवे से लेकर घुटनों के ऊपर तक पूरे पैर में सुबह से ही लगा लीजिए । नारियल तेल एंटीबायोटिक होता है।
8 -  खून में प्लेटलेट्स किसी भी वायरल फीवर में गिरते ही हैं।  बुखार में प्लेटलेट्स  गिरने से यह अनुमान लगा लेना की डेंगू  ही है यह गलत है। हाँ !  अगर यह प्लेटलेट्स 20 हजार से नीचे  आ गए हैं तो यह चिन्ता का विषय है । ऐसे में तुरन्त बिना समय गवाए doctor के पास जाएँ ।  वैसे प्लेटलेट्स गिरने पर एक होम्योपैथिक दवा है  EUPATORIUM PERFOIAM  200  ( Liquid dilution homeopathic medicine )  इसकी  3 - 4 बूंदे  प्रत्येक  2 - 2 घंटे पर साधारण पानी में डालकर मात्र 2 दिन पिलाएँ । गिरते हुए प्लेटलेट्स ठीक होना शुरू हो जाएंगे। recovery phase में आते ही platelet counts अपने आप बढना शुरू हो जाते हैं ।
9 -  किसी भी प्रकार का बुखार हो कम से कम 5 लीटर पानी जरूर पिएं । इसके अतिरिक्त नारियल पानी , नींबू नमक चीनी की शिकंजी , अनार का रस , बेल का शरबत ,पपीते का जूस, चुकन्दर का रस, कद्दू का 150 ml जूस 1 चम्मच शहद में मिलाकर,  omega 3, विटामिन सी की गोली,  कीवी फल,  इत्यादि जितनी अधिक मात्रा में ले सकते हैं ले। साथ ही गिलोय की बेल लगभग 8 इंच का टुकड़ा लेकर एक गिलास पानी में उबालें , जब पानी आधा रह जाए तो ठंडा करके मरीज को पिलाएं।  पानी और गिलोय अवश्य दें और उसके साथ ऊपर दी गई चीजों में से कम से कम   2-3 चीजें और दें।
10 -  तीखा, मसालेदार, भारी खाना न खाएँ । चाय, कॉफी, शराब, धूम्रपान न करें । प्रत्येक  2-2 घण्टे पर कुछ न कुछ खिलाते रहें ।
11 -  किसी भी प्रकार का वायरल बुखार 8 से 10 दिन का समय लेकर अपने आप ठीक हो जाता है । Doctor की सलाह लेकर कम से कम 2 दिन तक  दिन में तीन या चार बार  plain  Paracetamol  या Crocin Advance   खिलाएँ ।
12 - यदि तेज बुखार नहीं है , कमज़ोरी नहीं है और उसके साथ पानी और खाना उचित मात्रा में ले रहे हैं,  साथ ही हर 2-3 घण्टे पर urine pass हो रही है और प्लेटलेट्स 50 हजार से ज्यादा है तो घबराने वाली कोई बात नहीं है। हाँ ! यदि प्लेटलेट्स 20 हजार से नीचे आ गए हैं और नाक, आँख, दाँत या urine के साथ खून आने लगा है तो स्थिति  जानलेवा हो सकती है । इसलिए 50 हजार तक प्लेटलेट्स आते ही डेंगू का टेस्ट तुरन्त करवाएँ।
13 - डेंगू का टेस्ट अगर positive आता है तब क्या करें -- सबसे पहले तो घबराएं नहीं । एक से डेढ़ हफ्ते में वायरल अपने आप ही ठीक हो जाता है।  लगातार ज्यादा से ज्यादा पानी पिलाएं मरीज को और ध्यान रक्खें कि  हर दो से 3 घंटे में यूरिन pass  हो रही है या नहीं ? यदि हाँ तो चिंता की कोई बात नहीं है परन्तु urine यदि pass नहीं हो रही है तो तुरन्त मरीज को hospital लेकर जाएं ।
14 - डेंगू में बुखार रहना खतरनाक नहीं होता बल्कि बुखार उतर जाने के बाद नीचे  बताए लक्षण का आना थोड़ा सा चिंता जनक होता है किंतु यदि रोगी लगातार पानी पी रहा है और हर 2 घंटे के बाद उसे यूरिन पास हो रहा है एवं वह पूर्णतया विश्राम कर रहा है तो घबराने वाली कोई बात नहीं है।
15 - डेंगू बुखार के कुछ लक्षण हैं जो  दिखाई पड़ते ही तुरंत डॉक्टर को दिखाएँ --
जोड़ों में दर्द , बदन दर्द, सिर दर्द  एवं आँखों में दर्द
यदि लो और हाई BP में 40 से अधिक का अंतर आए,
लगातार पेट में हल्का-हल्का दर्द बना रहे
शरीर पर लाल चकतों का बनना।
जी मिचलाना , उल्टी आना
दस्त लगना
भूख कम लगना
तेज ठण्डी देकर बुखार आना
साँस लेने में दिक्कत
डेंगू की गम्भीर स्थिति में आँख , दाँत और नाक से खून आना
16 - जरा सा आराम होने पर शारीरिक श्रम करना रोगी के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। खान-पान सही रखने के साथ-साथ पूरा आराम बेहद आवश्यक है।
17 - डेंगू का उचित इलाज रोज़ाना कम से कम 5 लीटर पानी, सन्तुलित आहार,     कुछ खास तरह के फल एवं सब्जियों के रस,  नित्य कुछ व्यायाम एवं स्वयं की रोग प्रतिरोधक क्षमता ही है। कृपया अपने immune system को चुस्त-दुरुस्त रक्खें क्योंकि यही डेंगू बुखार से लड़ाई लड़ कर आपको बचा सकता है । अहम बात यह है कि अभी तक डेंगू की कोई वैक्सीन नहीं बनी है ।
       दोस्तों ! दीपावली के साथ ठंड की शुरुआत होती है और ठंड के साथ मच्छर अपने आप समाप्त होने लगते हैं इसलिए सभी से अनुरोध है कि अक्टूबर के अंत तक मच्छरों से अपने आपको बचा कर रखें और धैर्य पूर्वक  अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा स्वयं करें ।
                                                                                          धन्यवाद
                                                                                      नीलिमा कुमार

Monday, 30 April 2018

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम शहीद : महाराजा दाहिर सेन

     सातवीं सदी से पहले अफगानिस्तान और पाकिस्तान का कुछ हिस्सा फारस साम्राज्य के पास था बाकी सारा हिस्सा भारतीय राजाओं के अधीन था, साथ ही बलूचिस्तान एक स्वतंत्र सत्ता थी। यह भारत का पश्चिमी छोर शक, कुषाण और हूणों के पतन के बाद एकाएक कमजोर पड़ गया जिससे सातवीं सदी के बाद ही अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान भारत के हाथ से निकल गए।
     भारतवर्ष में इस्लामी शासन का पहला प्रवेश हुआ हिन्दुस्तान के सिन्ध साम्राज्य से। अरबों से छोटी-बड़ी असंख्य  लड़ाईयाँ लड़ते हुए लगभग  33 वर्षों तक भारत की रक्षा करने वाले शूरवीर राजा दाहिर सेन पहले ऐसे भारतीय राजा थे जिन्होंने इस्लामी सेना से युद्ध करते समय युद्ध क्षेत्र में वीरगति प्राप्त की और देश के लिए शहीद हुए। यह सच है कि उनकी मृत्युपरान्त ही इस्लामी फौज  सिंध पर कब्जा कर सकी। यह एक ऐसी युद्ध गाथा है जिस से ज्यादातर भारतीय अनभिज्ञ ही होंगे। 
        तो आईए .... आज हम महाराजा दाहिर सेन के वारे में  विस्तृत रूप से जानकारी हासिल करते हैं। हिंद देश के महाराजा थे राय साहसी द्वितीय जो हर्ष के समकालीन राजा थे , उनकी पत्नी का नाम रानी सुहानदी था एवं उनके कोई संतान नहीं थी अर्थात उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं था। महाराज राय साहसी की कार्यकारिणी समिति में एक चाच नामक ब्राह्मण था जो महाराज के सभी निजी कार्यों को देखा करता था। महाराज राय साहसी के मृत्युपरांत चाच ब्राह्मण ने महाराज की विधवा रानी सुहानदी से विवाह कर लिया और सिंध साम्राज्य का शासक बना। महाराज चाच के दो पुत्र हुए दाहिर सेन और दाहिर सिम। कुछ वर्षों के पश्चात ही दाहिर सिम की मृत्यु हो गई फलस्वरूप महाराज चाच के बाद सन् 679 ईस्वी में दाहिर सेन सम्पूर्ण सिंध के शासक बने और महाराजा दाहिर सेन कहलाए।

      राजा दाहिर सेन का भारत के इतिहास में नाम इसलिए नहीं मिलता है क्योंकि भारतीय इतिहास को वामपंथी धारणा के अनुरूप लिखा गया, जिसके अनुसार उन राजाओं का वर्णन इतिहास में वर्जित था जिनके बारे में लिखने से भारत में सांप्रदायिक वातावरण पर असर पड़ सकता था। राजा दाहिर सेन ने  मुस्लिम  धर्मगुरु इमाम मोहम्मद के परिवार को आश्रय दिया था। राजा दाहिर सेन और चंद्रगुप्त की सेनाओं के कर्बला देर से पहुँचने के कारण इमाम मोहम्मद को बचाया नहीं जा सका था।  खलीफा अल हज्जाज ने इमाम मोहम्मद के अंतिम वंशजों को ढूंढकर मारने की मुहिम चलाई थी। राजा दाहिर ने हुसैन इब्न अली को भी शरण दी थी जो इमाम मोहम्मद के पोते थे। हुसैन इब्न अली को भी सिंध जाते हुए कर्बला में पकड़ लिया गया था और मौत के घाट उतार दिया गया था। जी• एम• सईद के अनुसार सिंध प्राँत में हुसैन इब्न अली और राजा दाहिर सेन दोनों के लिए शोक मनाया जाता है। यहाँ यह भी बताना जरूरी है कि पाकिस्तान के इतिहास में भी दर्ज़ है कि मोहम्मद बिन कासिम उम्मयाद सल्तनत का एक सेनापति था और  उम्मयाद सल्तनत ने इमाम मोहम्मद और उनके वंश को नेस्तनाबूत करने की कसम खा रखी थी। इमाम हुसैन को मारने वाला याज़िद भी इसी उम्मयाद सल्तनत का था। इन सब बातों का विवरण " चाचनामा " में भी मिलता है जो कि उम्मयाद सल्तनत के काज़ी इस्माइल द्वारा राजा दाहिर सेन की मौत के बाद लिखाया गया था। इसका अंग्रेजी रूपांतरण  " हिस्ट्री ऑफ इंडिया " सर हेनेरी इलियाट द्वारा सन् 1900 ईस्वी में किया गया था।  इसके अतिरिक्त कन्नौज में रमल नाम के राजा ने महाराजा दाहिर पर हमला कर दिया था। प्रारंभिक हार के बाद राजा रमल अरौर की तरफ बढ़े। महाराजा दाहिर ने एक अरब अलाफी जो कि उम्मयाद ख़लीफत से निष्कासित किया गया था, के साथ मिलकर रमल की सेनाओं को परास्त किया जिससे प्रसन्न होकर महाराजा दाहिर सेन ने अपने   दरबार में अलाफी को विशेष स्थान प्रदान किया। हालांकि बाद में अलाफी केवल रक्षा सलाहकार के रूप में राजा दाहिर के साथ रहा और उसने लड़ाई में स्वयं कभी भी भाग नहीं लिया। इसके लिए बाद में अलाफी को खलीफा ने माफ कर दिया। साभार उपरोक्त विवरण " QUORA "  से लिया गया है। 
     भारत उस वक्त सोने की चिड़िया कहा जाता था, जाहिर है सिंध साम्राज्य धनाढ्य, समृद्ध और संपन्न था। उस समय सिंध देश समुद्री मार्ग द्वारा पूरे विश्व के साथ व्यापार करता था। सिंध का देवल बंदरगाह मुख्य केंद्र था। इराक - ईरान से आने वाले जहाज इसी बंदरगाह से होते हुए दूरदराज के देशों में जाया करते थे। भारतीय व्यापारियों के रहन-सहन और आने वाले माल-असबाब से अरब देश के लोग हिंदू साम्राज्य की ओर आकर्षित हुए। यह वही समय था जब सन् 632 ईसवी में अरब शासक हज़रत इमाम मोहम्मद की मृत्यु के बाद वहाँ के नए खलीफाओं और उनके उत्तराधिकारियों ने सीरिया, उत्तर अफ्रीका, स्पेन एवं ईरान को जीत लिया था। उस समय अरबी अपने साम्राज्य के विस्तार के साथ-साथ इस्लाम का प्रचार भी कर रहे थे। जब इन  अरबों ने इतनी जगह पर अपना कब्जा जमा लिया तो इनके मन में भारत पर भी विजय प्राप्त करने की लालसा जागृत हुयी। साथ ही युद्ध होने की एक वजह और भी थी। देवल बंदरगाह के निकट सिंध के समुद्री डाकुओं ने अरब के एक जहाज को लूट लिया और खलीफा उमर के अरब गवर्नर अल हज्जाज ने राजा दाहिर सेन से मुआवजा माँगा तो दाहिर सेन ने मुआवजा देने से यह कहकर मना कर दिया कि डाकुओं पर उनका कोई दबाव नहीं है। दाहिर सेन के इस जवाब से अरब खलीफा तिलमिला उठा और तभी से हिंद और सिंध साम्राज्य पर एक के बाद एक लगातार आक्रमण का सिलसिला चालू हो गया मगर राजा दाहिर सेन के कुशल नेतृत्व में सिंध पर विजय पाना इतना भी आसान नहीं था। सन् 711 ईस्वी तक महाराज दाहिर सेन के 35 साल के शासनकाल में अरबों ने छोटे बड़े बहुत से आक्रमण किए मगर सफलता नहीं मिली। तब सन्  712 ईस्वी में अरब शासक अल हज्जाज ने अपने दामाद एवं सेनापति मोहम्मद बिन कासिम को सिंध पर आक्रमण करने के लिए भेजा। गौरतलब है कि सन् 638 ईस्वी में अरब शासकों की नजर सिंध की तरफ उठी थी तब से लेकर सन् 711 ईस्वी के अंत तक 74 वर्षों के लम्बे  अन्तराल में  9 खलीफाओं ने 15 बार आक्रमण किया और पराजित हुए। कासिम की सेना समुद्री मार्ग से मकरान के रास्ते बढ़ते हुए देवल बंदरगाह जा पहुँची। कासिम जानता था कि सीधे आक्रमण से सिंध पर विजय नहीं पाई जा सकती इसलिए उसने कत्लेआम शुरू कर दिया, बच्चे बूढ़े जवान औरतें किसी को नहीं छोड़ा। जल्द ही नेरून दुर्ग पर उसने विजय पा ली, परँतु राजा दाहिर सेन के रहते सिंधु नदी पार कर पाना नामुमकिन था इसलिए उसने बौद्ध धर्म को मानने वाले हैदरपुर के राज्यपाल राजा मोक्षवास को अपने चंगुल में फँसाया। जग प्रसिद्ध है कि घर का भेदी ही लंका ढ़ाता आया है। यही नहीं  राजा मोक्षवास के साथ-साथ देवल के राजा ज्ञानबुद्ध ने भी इस अरबी सेना को खाने -पीने और रहने को  अपना राज्य भी दे दिया। अब कासिम ने हैदराबाद सिंध के नीरनकोट पर हमला कर दिया। नीरनकोट को जीतने के बाद अरबी सेना के साथ रावनगर पर हमला करके रावनगर को भी अपने अधीन कर लिया और अंत में कासिम चित्तौड़ पहुँचा, जहाँ उस का मुकाबला शूरवीर राजा दाहिर सेन के साथ हुआ। इस नौ दिनों तक चलने वाले भयंकर युद्ध में क्षत्रिय, जाट और ठाकुरों ने भी अपना सहयोग दिया। दाहिर सेन की सेना अरबों का सफाया करते हुए आगे बढ़ती रही। अरब सेना पूर्णतया  पराजय के कगार पर थी परन्तु भाग्य सिन्ध का भविष्य लिख चुका था। शताब्दियों से रणभूमि पर युद्ध के दौरान कुछ नियम होते थे, जिनमें से एक नियम था कि सूर्यास्त के बाद युद्ध नहीं किया जा सकता। उसी नियम के चलते दाहिर सेन की सेना रात में सो रही थी कि अचानक नियमों का उल्लंघन करते हुए कासिम ने सेना पर धावा बोल दिया जिसमें उसकी मदद की गद्दार राजा मोक्षवास और उसकी सेना ने, फिर भी यह युद्ध आगे 21 दिनों तक चलता रहा और गद्दार मोक्षवास की सहायता के बावजूद यह अरबी सेना परास्त हो गई। अब कासिम ने छल कपट का इस्तेमाल करते हुए स्वयं महिला रूप में दाहिर से मदद मांगी। चूँकि राजा दाहिर प्रजा की हर संभव मदद करते थे इसीलिए अपने इस स्वभाव के चलते वह कासिम के जाल में फँसकर अपनी सेना से काफी दूर निकल आए और वहाँ अरबी सेना से लड़ते-लड़ते अपने हाथी से नीचे गिर पड़े। बावजूद इसके 20 जून सन् 712 ईस्वी के दिन राऔर नाम के इस स्थान पर कासिम की सेना से लड़ते-लड़ते उन्होंने वीरगति प्राप्त की। इसके पश्चात कासिम की सेना सिंध में प्रवेश कर गई मगर वहाँ राजा दाहिर सेन की पत्नी महारानी लादी और किले में  मौजूद महिलाओं ने कासिम का स्वागत तीरों और भालों से किया जिससे अरबी सेना को पीछे हटना पड़ा। गद्दार राजा मोक्षवास की असलियत से अनभिज्ञ होने के कारण उसे आलौर के किले में प्रवेश मिल गया। रात में मोक्षवास द्वारा किले के द्वार खोल दिए गए और अरबी सेना किले में प्रवेश कर गई। यह देखकर महारानी लादी एवं किले में मौजूद सभी स्त्रियों ने अग्नि कुंड में कूदकर जौहर कर लिया। महाराजा दाहिर सेन की दोनों बेटियाँ पीछे रह गईं जिन्हें कासिम ने बंदी बनाया और उपहार स्वरूप तोहफे में खलीफा अल हज्जाज के लिए अरब भेज दिया। खलीफा दोनों बहनों सूर्या एवं परीमल का सौंदर्य देख फिदा हो गए लेकिन सूर्या और परीमल ने कूटनीति अपनाते हुए खलीफा को बताया कि वह दोनों पाक दामन नहीं हैं और उसका जिम्मेदार कासिम है। इतना सुनकर खलीफा आगबबूला हो गया और उसने हुक्म दिया कि कासिम को बैल के चमड़े की बोरी में बंद कर के दश्मिक में उनके सामने लाया जाए परन्तु रास्ते में ही चमड़े की उस बोरी में दम घुटने से कासिम की मौत हो गयी।  यह देखकर दोनों बहनों ने खलीफा को सच बताया कि उन्होंने झूूूठ बोला था, अब उन्होंने कासिम से अपने पिता की मौत का बदला ले लिया है। इतना कहकर जय सिन्ध,  जय दाहिर बोलते - बोलते एक दूसरेे के सीने में खंजर घोंपकर अपने प्राण ले लिए और अपने देश के लिए शहीद हो गई। यह देख कर खलीफा अल हज्जाज ने कहा  कि निश्चित ही  सिंध जैसा देश  हमने नहीं देखा  जहां की  स्त्रियां भी  अपने देश के प्रति  इतनी वफादार हैं।  सिंधु साम्राज्य को जीतने में हमने अपना सब कुछ खो दिया। राजाा दाहिर सेन का यह परिचय " REAL N ROYAL PANDIT'S....  "  में मिलता है,  तो वहीं दूसरी ओर " चाचनामा " नामक ऐतिहासिक दस्तावेज के अनुसार एक और तथ्य सामने आता है कि कासिम की मौत के बाद खलीफा को जब सूर्य और परिमल के झूठ का पता चला तो उन्होंने दोनों बहनों को जिंदा ही दीवार में चुनवा दिया। 
       इस युद्ध की " QUORA" के अनुसार इस युद्ध की एक कहानी और है। बसरा के अमीर अल हज्जाज इब्न युसुफ़ ने राजा दाहिर के ऊपर हमला किया। इसका मूल रूप कारण था सरनदीप के राजा द्वारा खलीफा को दिए गए उपहारों की चोरी। चोरी से नाराज होकर अल हज्जाज ने  महाराजा दाहिर सेन के ऊपर आक्रमण करने के लिए मोहम्मद बिन कासिम   को सन् 711 ईस्वी में भेजा। मोहम्मद बिन कासिम ने देवल पर हमला किया जिसे फतह करके वह नेरून गया जहाँ पर बुद्ध अनुयायी शासकों ने उसकी सहायता की। मोहम्मद बिन कासिम ने स्थानीय विपक्ष को अपने साथ मिलाकर महाराजा दाहिर पर हमला कर दिया और उनके पूर्वी राज्यों पर कब्जा कर लिया। राजा दाहिर ने मोहम्मद बिन कासिम को सिंध नदी को पार न करने देने के लिए मोर्चा संभाला इसके लिए उन्होंने अपनी सेनाओं को पूर्वी घाटों पर तैनात कर दिया जिसका नेतृत्व महाराजा दाहिर सेन का बेटा कर रहा था। परन्तु मोहम्मद बिन कासिम ने राजा दाहिर की सेना को हरा दिया, इसके बाद मोहम्मद बिन कासिम और राजा दाहिर के मध्य राऔर जो कि वर्तमान में नवाबशाह के नाम से जाना जाता है, में सन् 712 ईस्वी में युद्ध हुआ जिसमें राजा दाहिर वीरगति को प्राप्त हुए। हिंदू रिवाजों को निभाते हुए रानी लादी तथा सभी स्त्रियों ने जौहर कर वीरगति प्राप्त की। जब मोहम्मद बिन कासिम ने राजा दाहिर का कटा हुआ सिर अपने खलीफा अल हज्जाज के सामने रखा तो उसने कहा " हम ने सिंध पर बहुत मुश्किलों के बाद फतेह पाई है। मोहम्मद बिन कासिम ने  कूटनीति से महाराजा दाहिर सेन को हराया है, हमने उनकी सारी दौलत लूट ली है और अब वह जगह अंडे के छिलके की तरह नाजुक हो गई है "
       महाराजा दाहिर सेन एवं उनकी पत्नी लादी के वीरगति को प्राप्त हो जाने के बाद ही अरबों ने सिंध की राजधानी आलौर पर कब्जा कर लिया और इस प्रकार सन् 712 ईस्वी में सिन्ध साम्राज्य मुस्लिम अरबों के शासनाधीन हो गया।  यह भारत में इस्लामी शासन का पहला प्रवेश था। 
      इतिहास में अपने देश के लिए शहीद होने वाले प्रथम व्यक्ति के रूप में महाराजा दाहिर सेन का नाम सदैव दर्ज़ रहेगा। 
        उपरोक्त लेख में सभी नाम , तिथियाँ एवं घटनाएँ साभार अधोलिखित पुस्तकों एवं लेखों से संग्रहीत की गई हैं। 
1- पुस्तक - भारत भाग्य निर्माता - मंजू लोढ़ा
2 - दाहिर - भारतकोश
3 - ब्रह्मवीर ब्राह्मण राजा दाहिर सेन जी.... Real and                Royal King Dahir Sen....
4 -राजा दाहिर - विकिपीडिया
5 - भारत पर खलीफाओं की दुनिया का संक्षिप्त इतिहास -         वेबदुनिया

 6 -  QUORA
                                              नीलिमा कुमार

Friday, 2 February 2018

बाथरूम में गीज़र - कितना सुरक्षित ?

दोस्तों नमस्कार !
        मेरे घर में घटी एक घटना वैसे तो छोटी है पर अगर घटित हो जाती तो भयावह होती। अपने इस अनुभव को आप सब से बाँटना चाहती हूँ।  कृपया समय देकर पूरा पढ़िएगा क्योंकि कल आपके घर में भी ऐसा हो सकता है।
      दिनांक 1.02.18 दोपहर का 2:00 बजा था। मेरी बेटी ने गीज़र चालू किया और लेट कर इंतजार करने लगी पानी गरम होने का और उसी में वह सो गई। लगभग डेढ़ घंटे बाद अचानक एक धमाके की आवाज से उसकी आँख खुली तो पाया बाथरूम से बड़ी भयंकर आवाजें आ रही थीं। बाथरूम खोला तो देखा गीज़र से पानी बहुत ही तेज धार के साथ सामने वाली दीवार को भिगो रहा था, उसने सोचा कि गीज़र का स्विच बँद कर दें परंतु 2 दिन से तेज बुखार के चलते भीगने के डर से वह बाथरुम में नहीं गई और भागती हुई मेरे पास आई। मैंने सबसे पहले मेन स्विच बन्द करवाया फिर इलेक्ट्रीशियन को फोन किया।
      ईश्वर को बहुत-बहुत धन्यवाद है कि उसने एक हादसा होने से रोक दिया। अगर वह बाथरूम में चली गई होती तो खौलते पानी से जलती तो बाद में पहले वह पूरे बाथरूम में आए करेंट की चपेट में आ जाती। इस हादसे से मैंने कुछ सीखा है, बस वही आप सब तक पहुँचाने की मेरी एक कोशिश है।
1. सर्वप्रथम 24 घंटे गीज़र को ऑन करके ना छोड़ें।
2. गीज़र में पानी गर्म हो जाने के बाद गीज़र बंद करें और तब नहाने जाएँ।
3. ऐसी परिस्थिति आने पर सर्वप्रथम main switch off करें।
4. गीज़र से निकलने वाले outlet और inlet वाले पाइप के ऊपर जरा भी कैल्शियम का deposition दिखाई पड़े तो तुरँत उस पाइप को बदलवाएं। इसकी एक फोटो भी यहाँ share कर रही हूँ।
5. साल में एक बार गीजर की servicing अवश्य करवाएं, चाहे जाड़े की शुरुआत में अन्यथा जाड़े गुज़र जाने के बाद। ( जिस प्रकार AC की servicing करवायी जाती है ) एक season  इस्तेमाल करने के बाद गीज़र के अन्दर element के ऊपर calcium deposit हो ही जाता है, थोड़ा या ज़्यादा वो पानी की quality पर निर्भर करता है।
6. एक छोटी सी सलाह - कम से कम जो लोग अब अपना नया घर बनवा रहे हों, तो वह गीजर बाथरुम के बाहर duct में लगवाएं।
7. सीट के ऊपर लगाए जाने वाले गीज़र कभी गिर भी सकते हैं या उसके पाइप फट सकते हैं। सोचिए अगर उस वक्त कोई सीट पर बैठा हो तो उसका क्या होगा ?
8. घर के बड़े हों, बच्चे हों या महिलाएं कृपया सभी को main metar के बारे में जानकारी होनी चाहिए और main switch से suply  कैसे बंद की जाती है यह उन्हें मालूम होना चाहिए।
           यह हादसा मेरे घर में होते होते बचा है। आपके घर में ना हो इसलिए उम्मीद करती हूँ  कि मेरे इस अनुभव से आप सब भविष्य में सचेत रहेंगे।
                                                          धन्यवाद
                                                      नीलिमा कुमार

Sunday, 31 December 2017

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ

दिन महीने साल क्या
हर पल बदलता जाता है
पर हाँ !
नहीं बदलता तो बस वो एहसास है
जो रिश्तों के मोती को
धागे में पिरोए रखता है।
धीरे धीरे सरकते ए बीतते पल !
शुक्रिया है तेरा
जो मेरी माला में
आपको मोती सा पिरोए रक्खा।
और इसी यकीं के साथ आगाज है तेरा
दस्तक दे रहे सुनहरे पल !
कि रिश्तो से बुने धागों की इस माला में
आप की माला का मोती मैं
और मेरी माला का मोती बन ,
आप हर पल चमकते रहें।

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ
                                           
                                    नीलिमा

Saturday, 9 September 2017

Read seriously: Blue Whale game या मौत का खेल ? क्या , क्यों, कैसे .. ?

दोस्तों!
जिनके 10 साल से लेकर 20 - 21 साल तक के बच्चे हैं कृपया उन्हें इस वीडियो को देखने एवं समझने की बहुत जरूरत है। सभी माता पिता से अनुरोध है कि अपने व्यस्ततम् समय में से रोज़ अपने बच्चे के लिए ज्यादा से ज्यादा वक्त निकालने की कोशिश करें और उसकी एक एक बात को ध्यान से सुनें एवं उसकी परेशानियों से उसे बाहर निकालें। खासकर अगर बच्चा अलग जाकर mobile पर कोई game खेल रहा है तो ये खतरे की घण्टी है आपके लिए । खुद सम्भलिए और बच्चे को सम्भालिए वर्ना आप अपने बच्चे को हमेशा के लिए खो देंगे फिर चाहे बेटा हो या बेटी। कभी कभी हम सोचते हैं कि हमारा बच्चा सब सम्भाल लेगा, वो बहुत strong है किन्तु सच ये नहीं होता। जब माँ - बाप के अपने प्रति इस विश्वास पर बच्चा खुद को खरा नहीं पाता है तो वो अंदर ही अंदर टूटने लगता है , यहीं से शुरूआत होती है अवसाद की या कभी कभी बच्चा आपसे कुछ कहना चाहता है पर आपके पास इतना समय ही नही होता है कि आप उसकी अनकही बातों को समझने का प्रयास करें। अपना समय देते हुए धैर्य के साथ उसके मन से उन बातों को निकालने का प्रयास कीजिए, जो वो आपको बताना चाहता है । जरूरत हो तो doctor की मदद लीजिए । कैसी शर्म ? बच्चा तो आपका है, उसे कुछ हुआ तो जिन्दगी भर का दर्द आपके खाते में आएगा , समाज के खाते में नहीं। और सबसे बड़ी बात हमें ये समझनी होगी कि आज की जिन्दगी और 15 - 20 साल पहले की जिन्दगी में ज़मीन आसमान का अन्तर है। हम माने न माने आज जिन्दगी इतनी आसान नहीं रह गयी है। इसीलिए सबसे पहले हमें एक सोच को अपनी जिन्दगी से बाहर फेंकना होगा - हमारे समय में तो ऐसा होता था, हम कर लेते थे तुमसे तो कुछ नहीं होगा।
दोस्तों ! आज अखबार की एक खबर ने मुझे ये सब लिखने पर मजबूर कर दिया । मैं लखनऊ में रहती हूँ और आज के अखबार की एक खबर आप सब तक पहुँचा रही हूँ । अगर मेरा ये प्रयास किसी के भी काम आ सका तो मैं समझूंगी कि मैंने अपनी जिंदगी में कोई एक काम तो अच्छा किया। आप सभी से आशा करती हूँ कि आप इसे share ज़रूर करेंगे ।

Tuesday, 15 August 2017

71 वें स्वतंत्रता दिवस.. शुभ संध्या पर शुभकामनाएँ। जहाँ गर्व अभिमान का पल...

दोस्तों! 71 वें स्वतंत्रता दिवस की शुभ संध्या पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। जहाँ ये दिन हम सब के लिए गर्व और अभिमान का पल लाता है तो वहीं आज के परिप्रेक्ष्य में हमें कुछ सोचने पर मजबूर भी करता है। जितना मुझे याद है सम्भवतः सन् 1976 में अलीगढ़ में हुए दंगों के बाद हालात काफी ख़राब हो गए थे, उसी दौरान मैंने कुछ पंक्तियाँ लिखी थी। अपने उन्हीं जज़बातों को आज आप सबसे बाँटना चाहती हूँ ----

हे भारतवासी ! अपने गौरव की रक्षा करना,
हे कुलदीपक ! अपनी माँ की रक्षा करना,

भूलो नहीं कभी अपने अभिमान को,
भूलो नहीं कभी अपनी इस शाम को,
तुमने हिटलर नहीं टेरेसा का जीवन है,
रावण नहीं राम की गाथा का उपवन है,
भूलो नहीं यहाँ सूरज से दिन होता है,
रात यहाँ चंदा सी शीतल होती है,
सदा सर्वदा गतिमान बढ़ने की इच्छा करना,
हे भारतवासी ! अपने गौरव की रक्षा करना।
हे भारतवासी ! अपने गौरव की रक्षा करना।

यहाँ वायु में मलय गन्ध मिलती है,
पावन गंगा भी इसी भूमि में बहती है,
वीणा में झँकार यहाँ होती है,
वेदों की ध्वनि कण-कण में मिलती है,
सदा देववाणी मुखरित होती है,
अपने कुल वैभव की रक्षा करना,
हे भारतवासी ! अपने गौरव की रक्षा करना,
हे भारतवासी ! अपने गौरव की रक्षा करना
                                              नीलिमा कुमार

Tuesday, 18 July 2017

उस अनजान चितेरे की अनुपम चित्रकारी:

कभी धुआँधार तो कभी झिमिर झिमिर कर बरसती रिमझिम फुहारों से धुला धुला सा मेरा शहर कितना खूबसूरत लग रहा था। दो दिन के बाद सँध्या समय आसमान खुला और भास्कर ने कुछ यूँ छटा बिखेरी कि अपने बैठक की बालकनी से इन खूबसूरत नजारों को अपने कैमरे में कैद करने से स्वयं को रोक न सकी, सोचा इन खूबसूरत नजारों को आप सबसे साझा करूँ । क्या कहते हैं ?  मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं----
चित्रांकन समय :  7 जुलाई सायं 7.30 बजे