दोस्तों नमस्कार !
मेरे घर में घटी एक घटना वैसे तो छोटी है पर अगर घटित हो जाती तो भयावह होती। अपने इस अनुभव को आप सब से बाँटना चाहती हूँ। कृपया समय देकर पूरा पढ़िएगा क्योंकि कल आपके घर में भी ऐसा हो सकता है।
दिनांक 1.02.18 दोपहर का 2:00 बजा था। मेरी बेटी ने गीज़र चालू किया और लेट कर इंतजार करने लगी पानी गरम होने का और उसी में वह सो गई। लगभग डेढ़ घंटे बाद अचानक एक धमाके की आवाज से उसकी आँख खुली तो पाया बाथरूम से बड़ी भयंकर आवाजें आ रही थीं। बाथरूम खोला तो देखा गीज़र से पानी बहुत ही तेज धार के साथ सामने वाली दीवार को भिगो रहा था, उसने सोचा कि गीज़र का स्विच बँद कर दें परंतु 2 दिन से तेज बुखार के चलते भीगने के डर से वह बाथरुम में नहीं गई और भागती हुई मेरे पास आई। मैंने सबसे पहले मेन स्विच बन्द करवाया फिर इलेक्ट्रीशियन को फोन किया।
ईश्वर को बहुत-बहुत धन्यवाद है कि उसने एक हादसा होने से रोक दिया। अगर वह बाथरूम में चली गई होती तो खौलते पानी से जलती तो बाद में पहले वह पूरे बाथरूम में आए करेंट की चपेट में आ जाती। इस हादसे से मैंने कुछ सीखा है, बस वही आप सब तक पहुँचाने की मेरी एक कोशिश है।
1. सर्वप्रथम 24 घंटे गीज़र को ऑन करके ना छोड़ें।
2. गीज़र में पानी गर्म हो जाने के बाद गीज़र बंद करें और तब नहाने जाएँ।
3. ऐसी परिस्थिति आने पर सर्वप्रथम main switch off करें।
4. गीज़र से निकलने वाले outlet और inlet वाले पाइप के ऊपर जरा भी कैल्शियम का deposition दिखाई पड़े तो तुरँत उस पाइप को बदलवाएं। इसकी एक फोटो भी यहाँ share कर रही हूँ।
5. साल में एक बार गीजर की servicing अवश्य करवाएं, चाहे जाड़े की शुरुआत में अन्यथा जाड़े गुज़र जाने के बाद। ( जिस प्रकार AC की servicing करवायी जाती है ) एक season इस्तेमाल करने के बाद गीज़र के अन्दर element के ऊपर calcium deposit हो ही जाता है, थोड़ा या ज़्यादा वो पानी की quality पर निर्भर करता है।
6. एक छोटी सी सलाह - कम से कम जो लोग अब अपना नया घर बनवा रहे हों, तो वह गीजर बाथरुम के बाहर duct में लगवाएं।
7. सीट के ऊपर लगाए जाने वाले गीज़र कभी गिर भी सकते हैं या उसके पाइप फट सकते हैं। सोचिए अगर उस वक्त कोई सीट पर बैठा हो तो उसका क्या होगा ?
8. घर के बड़े हों, बच्चे हों या महिलाएं कृपया सभी को main metar के बारे में जानकारी होनी चाहिए और main switch से suply कैसे बंद की जाती है यह उन्हें मालूम होना चाहिए।
यह हादसा मेरे घर में होते होते बचा है। आपके घर में ना हो इसलिए उम्मीद करती हूँ कि मेरे इस अनुभव से आप सब भविष्य में सचेत रहेंगे।
धन्यवाद
नीलिमा कुमार
Friday, 2 February 2018
बाथरूम में गीज़र - कितना सुरक्षित ?
Sunday, 31 December 2017
नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ
दिन महीने साल क्या
हर पल बदलता जाता है
पर हाँ !
नहीं बदलता तो बस वो एहसास है
जो रिश्तों के मोती को
धागे में पिरोए रखता है।
धीरे धीरे सरकते ए बीतते पल !
शुक्रिया है तेरा
जो मेरी माला में
आपको मोती सा पिरोए रक्खा।
और इसी यकीं के साथ आगाज है तेरा
दस्तक दे रहे सुनहरे पल !
कि रिश्तो से बुने धागों की इस माला में
आप की माला का मोती मैं
और मेरी माला का मोती बन ,
आप हर पल चमकते रहें।
नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ
नीलिमा
Saturday, 9 September 2017
Read seriously: Blue Whale game या मौत का खेल ? क्या , क्यों, कैसे .. ?
दोस्तों!
जिनके 10 साल से लेकर 20 - 21 साल तक के बच्चे हैं कृपया उन्हें इस वीडियो को देखने एवं समझने की बहुत जरूरत है। सभी माता पिता से अनुरोध है कि अपने व्यस्ततम् समय में से रोज़ अपने बच्चे के लिए ज्यादा से ज्यादा वक्त निकालने की कोशिश करें और उसकी एक एक बात को ध्यान से सुनें एवं उसकी परेशानियों से उसे बाहर निकालें। खासकर अगर बच्चा अलग जाकर mobile पर कोई game खेल रहा है तो ये खतरे की घण्टी है आपके लिए । खुद सम्भलिए और बच्चे को सम्भालिए वर्ना आप अपने बच्चे को हमेशा के लिए खो देंगे फिर चाहे बेटा हो या बेटी। कभी कभी हम सोचते हैं कि हमारा बच्चा सब सम्भाल लेगा, वो बहुत strong है किन्तु सच ये नहीं होता। जब माँ - बाप के अपने प्रति इस विश्वास पर बच्चा खुद को खरा नहीं पाता है तो वो अंदर ही अंदर टूटने लगता है , यहीं से शुरूआत होती है अवसाद की या कभी कभी बच्चा आपसे कुछ कहना चाहता है पर आपके पास इतना समय ही नही होता है कि आप उसकी अनकही बातों को समझने का प्रयास करें। अपना समय देते हुए धैर्य के साथ उसके मन से उन बातों को निकालने का प्रयास कीजिए, जो वो आपको बताना चाहता है । जरूरत हो तो doctor की मदद लीजिए । कैसी शर्म ? बच्चा तो आपका है, उसे कुछ हुआ तो जिन्दगी भर का दर्द आपके खाते में आएगा , समाज के खाते में नहीं। और सबसे बड़ी बात हमें ये समझनी होगी कि आज की जिन्दगी और 15 - 20 साल पहले की जिन्दगी में ज़मीन आसमान का अन्तर है। हम माने न माने आज जिन्दगी इतनी आसान नहीं रह गयी है। इसीलिए सबसे पहले हमें एक सोच को अपनी जिन्दगी से बाहर फेंकना होगा - हमारे समय में तो ऐसा होता था, हम कर लेते थे तुमसे तो कुछ नहीं होगा।
दोस्तों ! आज अखबार की एक खबर ने मुझे ये सब लिखने पर मजबूर कर दिया । मैं लखनऊ में रहती हूँ और आज के अखबार की एक खबर आप सब तक पहुँचा रही हूँ । अगर मेरा ये प्रयास किसी के भी काम आ सका तो मैं समझूंगी कि मैंने अपनी जिंदगी में कोई एक काम तो अच्छा किया। आप सभी से आशा करती हूँ कि आप इसे share ज़रूर करेंगे ।
Tuesday, 15 August 2017
71 वें स्वतंत्रता दिवस.. शुभ संध्या पर शुभकामनाएँ। जहाँ गर्व अभिमान का पल...
दोस्तों! 71 वें स्वतंत्रता दिवस की शुभ संध्या पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। जहाँ ये दिन हम सब के लिए गर्व और अभिमान का पल लाता है तो वहीं आज के परिप्रेक्ष्य में हमें कुछ सोचने पर मजबूर भी करता है। जितना मुझे याद है सम्भवतः सन् 1976 में अलीगढ़ में हुए दंगों के बाद हालात काफी ख़राब हो गए थे, उसी दौरान मैंने कुछ पंक्तियाँ लिखी थी। अपने उन्हीं जज़बातों को आज आप सबसे बाँटना चाहती हूँ ----
हे भारतवासी ! अपने गौरव की रक्षा करना,
हे कुलदीपक ! अपनी माँ की रक्षा करना,
भूलो नहीं कभी अपने अभिमान को,
भूलो नहीं कभी अपनी इस शाम को,
तुमने हिटलर नहीं टेरेसा का जीवन है,
रावण नहीं राम की गाथा का उपवन है,
भूलो नहीं यहाँ सूरज से दिन होता है,
रात यहाँ चंदा सी शीतल होती है,
सदा सर्वदा गतिमान बढ़ने की इच्छा करना,
हे भारतवासी ! अपने गौरव की रक्षा करना।
हे भारतवासी ! अपने गौरव की रक्षा करना।
यहाँ वायु में मलय गन्ध मिलती है,
पावन गंगा भी इसी भूमि में बहती है,
वीणा में झँकार यहाँ होती है,
वेदों की ध्वनि कण-कण में मिलती है,
सदा देववाणी मुखरित होती है,
अपने कुल वैभव की रक्षा करना,
हे भारतवासी ! अपने गौरव की रक्षा करना,
हे भारतवासी ! अपने गौरव की रक्षा करना
नीलिमा कुमार
Tuesday, 18 July 2017
उस अनजान चितेरे की अनुपम चित्रकारी:
कभी धुआँधार तो कभी झिमिर झिमिर कर बरसती रिमझिम फुहारों से धुला धुला सा मेरा शहर कितना खूबसूरत लग रहा था। दो दिन के बाद सँध्या समय आसमान खुला और भास्कर ने कुछ यूँ छटा बिखेरी कि अपने बैठक की बालकनी से इन खूबसूरत नजारों को अपने कैमरे में कैद करने से स्वयं को रोक न सकी, सोचा इन खूबसूरत नजारों को आप सबसे साझा करूँ । क्या कहते हैं ? मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं----
चित्रांकन समय : 7 जुलाई सायं 7.30 बजे
Saturday, 27 May 2017
Tiger Reserve, Chuka Eco Tourism Spot, Mahof Range, Pilibhit
online booking : www.ptr-pilibhit.in
Neelima Kumar
Tiger Reserve, Chuka Eco Tourism Spot, Mahof Range, Pilibhit
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में शारदा नदी पर बनाई गई एशिया की सबसे बड़ी झील है। इस इलाके में पानी की कमी के कारण वर्षों पूर्व अंग्रेजों ने सिंचाई हेतु शारदा के पानी को रोककर बाँँध तैयार किया और नहरों का निर्माण किया। झील के एक किनारे पर है पूरा उत्त्तराखंड और दूसरे किनारे पर है "टाइगर रिज़र्व, चूका इको टूरिज़्म स्पाॅट, महोफ रेंज, पीलीभीत"। इसी झील पर बने "शारदा सागर डैम" के किनारे के जंगलों में सन् 2001 में "चूका इको स्पाॅट" को विकसित किया गया। पीलीभीत की सीमा खत्म भी नहीं होती है और वन्य जीवों से भरा प्राकृतिक जंगल प्रारंभ हो जाता है। पीलीभीत से माधव टांडा होते हुए लगभग 25 कि•मी•जंगल में अंदर पहुंच जाने पर एक पक्का पुल और उसके नीचे बहती पक्की शारदा नहर दिखाई पड़ती है। अंग्रेजों की बनाई यह पक्की नहर बहुत गहरी और चौड़ी है, बस इसी पक्के पुल को पार करते ही "चूका इको टूरिज़्म स्पॉट " का प्रमुख द्वार दिखाई पड़ता है। इस द्वार पर प्रवेश शुल्क ₹ 300 एवं प्रति व्यक्ति 100 रुपए एक बार देय होता है। इसी द्वार से प्रारंभ होती है लगभग 6 किलोमीटर की कच्ची, काली घुमावदार सड़क जो कि रेत और काली मिट्टी से बनाई गई है। बिना हाॅर्न एवं शोर किए हुए शांति के साथ लगभग डेढ़ किलोमीटर इस सड़क पर आगे बढ़ते ही शारदा डैम की उठती-गिरती बड़ी-बड़ी लहरों की कल कल ध्वनि हमारे कानों में पड़ने लगती है। घना जंगल, सर्पीली कच्ची सड़कें, मीलों फैली खामोशी में चहचहाते पंछियों का कलरव, हमें देख डर कर कुलाचें मार कर भागते हिरन एवं बारहसिंघों का झुंड, ठंडी हवाओं में पंख फैलाकर नाचते- झूमते मोर हमारे मन को झूमने के लिए मजबूर कर देते हैं। इन्हीं एहसासों के बीच से गुजरते हुए हम आ पहुँचते हैं जंगल के बीच बनाए गए इस ढाई हेक्टेयर वाले चूका इको स्पाॅट के बीचो-बीच, जहाँ प्रकृति की गोद में ही पर्यटकों के रहने की व्यवस्था की गई है। इस इलाके में थारू जाति के आदिवासी निवास करते हैं इसीलिए वन विभाग ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सन् 2001 में पहली थारू हट बनवाई । धीरे-धीरे इसे बढ़ाया गया। 9 जून 2014 को यह पर्यटक स्थल टाइगर रिजर्व क्षेत्र में शामिल हुआ। इस पर्यटक स्थल का संचालन वहाँ की local society " संयुक्त वन प्रबन्ध समिति , मुस्तफाबाद " कर रही है।
दोस्तों ! जिन लोगों को शांति, प्राकृतिक सुँदरता, भोर की उगती हुई किरणें, ढलते सूरज की लालिमा, पेड़ों के हरे - हरे पत्तों के बीच से छनकर आती सुनहरी किरणें, पंछियों का कलरव, जंगली जानवरों की आवाजें, साइबेरिया से आए दुर्लभ पक्षियों की ख़ूबसूरती को निहारने की तमन्ना, टाइगर से प्यार भरी मुलाकात की हसरतें, रात के अंधेरे में पेड़ों की सरसराहट, दूर-दूर तक फैले सन्नाटे में लहरों के थपेड़ों की भयावह आवाजें, तो वहीं दूर तलक झील में फैली चाँद की खूबसूरत चाँदनी, रात तो छोड़िए दिन में भी जमीन पर फैले पत्तों पर कोई निकल जाए तो सूखे पत्तों की चर्र - चर्र की वो आवाज़ें मन को मोहने के लिए काफी हैं। झील का पानी इतना साफ कि किनारे पर 8 फुट गहराई में भी लहराते शैवाल बहुत ही खूबसूरत और साफ दिखाई पड़ते हैं ।आस पास खड़े पेड़ों की परछांई यह भ्रम पैदा करती है कि शायद यह पेड़ झील की तलहटी में ही लहरा रहा है। यह झील इतनी बड़ी है कि किनारा नहीं दिखता, बस दूर कहीं आसमाँ और धरती के मिलने का विहँगम दृश्य दिखलाई पड़ता है। अगर कहा जाए कि जिन्हें प्रकृति एवं वन्य जीवों को अपने कैमरे में कैद करना पसंद है, adventure पसंद है, तो उनके लिए यह जगह ideal है।
हाँ ! एक बात यहाँ यह जरूर बताना चाहती हूँ कि हमने दो दिनों में मात्र एक सफारी ली थी, किंतु हमारे वहाँ से निकलने के बाद कुछ Americans आए थे जो कि वहाँ 3 दिन रहे और उसमें उन्होंने 5 सफारी ली, जिसमें आखरी दिन उन्हें टाइगर दिखा। कहने का तात्पर्य है कि समय लेकर जाईए। यह जंगली जानवर मनमौजी होते हैं। जी चाहेगा तो अपने आप को हमारे सामने ले आएँगे अन्यथा हमें बिना उनसे मिले ही वापस लौटना पड़ता है।
कुछ विशेष जानकारी आपके लिए यहाँ दे रही हूँ -- " चूका ईको स्पॉट " घूमने का best season है -- मार्च, अप्रैल एवं मई । इसके बंद होने का समय होता है -- 15 जून से 15 नवंबर तक। जाड़े के मौसम में हाड़- माँस को कंपकंपाने वाली ठंड पड़ती है तो वही गर्मी में सुलगती आग भी बरसती है। मगर क्या करें टाइगर प्रेमियों ! अगर टाइगर से मिलना है तो गर्मी में ही जाना होगा और अगर प्राकृतिक सौंदर्य से अपने हृदय को अभिभूत करना है तब जाड़े का मौसम ही अच्छा है। वैसे भी बासों और मिट्टी से बनी यहाँ की थारू हटें हों, पेड़ पर बाँस की बनी झोपड़ी हो या झील के अंदर बाँस के जाल पर बनी बाँस की झोपड़ी और उसका बड़ा सा टेरेस हो, आप कहीं भी रहो अपने आप में एक अद्भुत रोमाँचक अनुभव है। फरवरी के महीने में वहाँ से तो एक बहुत गरम रजाई मिली ही थी और हम अपनी भी एक रजाई लेकर गए थे, परन्तु ठण्ड का आलम कुछ ऐसा था कि टोपी भी लगानी पड़ जाती थी। बाथरूम तो बहुत अच्छे थे पर नलों में गरम पानी नहीं था। ब्रश करने के लिए गरम पानी की बाल्टी मंगानी होती थी। या यूँ कहें कि फरवरी में मौसम, पहाड़ों के मौसम की तरह ही था। खुद ही सोचिए ! हवा और पानी की आवाजों का संगम हो, बाँस की झोपड़ी हो, ना कोई TV , न शोर हो, उस पर से बिजली भी ना हो, तो कितना रोमाँचक होगा यह अनुभव। दरअसल सिर्फ जनरेटर से ही बिजली आती है वह भी मात्र 3 घंटे के लिए, बाकी समय तो आपको solar energy वाले लैंपों से ही काम चलाना पड़ेगा। हमें भी उस रिहाएशी इलाके में केवल Vodafone के signals ही मिले, जंगलों में तो वो भी नहीं थे। मगर इस सबसे डरने की जरूरत बिलकुल भी नहीं है क्यों कि सुरक्षा के पुख्ता इन्तज़ाम भी हैं। 2.5 हेक्टेयर वाला यह इलाका काँटों वाली बाढ़ के साथ साथ 440 volt वाली electrical fence से घिरा हुआ है, साथ ही ये fence पूरी तरह से solar power द्वारा back up में भी है। सारा डर तब खतम हो जाता है जब वहाँ का आदमी आपसे ये कहता है कि आप आराम से सो जाइए मैं बाहर बैठा रहूँगा । सुबह और सुहानी लगती है जब आप नाश्ते में गरमा गरम पराठे खाना चाहें या खाने में चूल्हे पर पकाया गया खाना, सब कुछ आपको आपके कमरे में लाकर बड़े प्यार और धैर्य से खिलाते हैं यहाँ के canteen boy। थोड़ी सी परेशानी non veg n hard drinks वालों को होती है, क्यों कि ये दोनों ही चीजें strictly prohibited हैं।
तो लीजिए यहाँ के कुछ चित्र जो हमने अपने कैमरे में कैद किए थे उन्हें आप सबके लिए डाल रही हूँ। अन्य जानकारी अथवा बुकिंग हेतु कुछ नाम और नम्बर लिख रही हूँ जिनसे आप सीधे संपर्क कर सकते हैं --



